हमारी भी तमन्ना थी मुस्कुराने की ,
हमारी भी तमन्ना थी किसी को अपना बनाने की ।
हमारी भी तमन्ना तोड़ी उसी ने ,
जो हुआ करती थी वजय हमरी मुस्कुराने की ।
अब तो शायद मुस्कुरा भी न पाए कभी ,
क्योंकि मुस्कुराहट भी तो उसी ने छीनी ,
जिसकी चाहत थी हमारे साथ ज़िंदगी बिताने की ।
तोड़ने को तो हम भी तोड़ सकते थे दिल उसका ,
पर सुना है की बहुत बड़ी है सजा किसी मासूम के दिल को चोट पहुंचाने की ।
तो क्या हुआ जो छीन कर ले गया मुस्कान वो मेरी ,
क्यूकी खता तो हमारी थी जो जिद कर बेठा था चाँद से उसकी चाँदनी चुराने की।
हमारी भी तमन्ना थी मुस्कुराने की ,
हमारी भी तमन्ना थी किसी को अपना बनाने की
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